कलाई का जादूगर” गुंडप्पा विश्वनाथ: सौंदर्य और संयम की मिसाल
(Patiala 12th February Navneet Bansal News room Bureau) भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी बल्लेबाज़ी आंकड़ों से अधिक अपनी कला और शालीनता के लिए याद की जाती है। गुंडप्पा रंगनाथ विश्वनाथ (जी. आर. विश्वनाथ) उन्हीं में से एक हैं। 12 फरवरी 1949 को जन्मे विश्वनाथ आज अपनी जयंती पर क्रिकेट प्रेमियों की स्मृतियों में ताज़ा हो उठते हैं। 1969 में कानपुर टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनका पदार्पण किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। पहली पारी में शून्य पर आउट होने के बाद दूसरी पारी में उन्होंने शानदार 137 रन बनाकर आलोचकों को जवाब दिया और भारतीय क्रिकेट में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। यह पारी आज भी भारतीय टेस्ट इतिहास की यादगार डेब्यू पारियों में गिनी जाती है। विश्वनाथ की बल्लेबाज़ी में आक्रामकता से अधिक नज़ाकत और तकनीकी शुद्धता दिखती थी। उनका स्क्वेयर कट और लेट कट क्रिकेट प्रेमियों के लिए किसी कला प्रदर्शन से कम नहीं था। वे कठिन परिस्थितियों में टीम को संभालने वाले भरोसेमंद बल्लेबाज़ रहे।
अपने टेस्ट करियर में उन्होंने 91 मैचों में 6080 रन बनाए, जिसमें 14 शतक शामिल हैं। 1974-75 में वेस्टइंडीज के खिलाफ चेन्नई में खेली गई 97 रन की पारी को आज भी उनकी सर्वश्रेष्ठ पारियों में शुमार किया जाता है। उस दौर की तेज और उछालभरी पिचों पर उनका औसत 41 के आसपास रहना उनकी तकनीकी दक्षता का प्रमाण है। विश्वनाथ केवल एक उत्कृष्ट बल्लेबाज़ ही नहीं, बल्कि खेल भावना के प्रतीक भी रहे। 1980 में इंग्लैंड के खिलाफ मुंबई टेस्ट में उन्होंने विरोधी बल्लेबाज़ बॉब टेलर को गलत निर्णय के बाद वापस बुलाने की पहल की, जो आज भी क्रिकेट इतिहास में खेल भावना की मिसाल है।
आज उनकी जयंती पर भारतीय क्रिकेट उस कलाकार को नमन करता है, जिसने बल्ले को ताकत नहीं, बल्कि सौंदर्य और संयम का माध्यम बनाया
