अमर बलिदान की गाथा: शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव
(पटियाला, 23 मार्च , फीचर आर्टिकल नवनीत बंसल, न्यूजरूम7)
23 मार्च भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण दिन है। इसी दिन वर्ष 1931 में भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को ब्रिटिश हुकूमत ने फाँसी दे दी थी। यह दिन आज शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
क्रांति की शुरुआत
20वीं सदी के प्रारंभ में भारत में अंग्रेजों के खिलाफ असंतोष तेजी से बढ़ रहा था। विशेष रूप से युवा वर्ग में क्रांति की भावना प्रबल थी।
इन क्रांतिकारियों का उद्देश्य था — भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराना।
भगत सिंह बचपन से ही देशभक्ति से ओत-प्रोत थे। जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा, जिसने उनके मन में अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की भावना को और मजबूत कर दिया।
लाला लाजपत राय की मृत्यु और प्रतिशोध
1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाहौर में हुए लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में उनका निधन हो गया। इस घटना का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अंग्रेज अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट को मारने की योजना बनाई, लेकिन गलती से सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी (1928)।
सेंट्रल असेम्बली बम कांड (1929)
1929 में भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेम्बली में बम फेंका। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह बम किसी को मारने के लिए नहीं, बल्कि “बहरे कानों को सुनाने के लिए” फेंका गया था। बम फेंकने के बाद उन्होंने खुद को गिरफ्तार करवाया और अदालत को अपने विचारों का मंच बनाया।
मुकदमा और जेल जीवन
जेल में भगत सिंह और उनके साथियों ने भारतीय कैदियों के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ भूख हड़ताल की।उनकी यह हड़ताल पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई और लाखों लोग उनके समर्थन में खड़े हो गए। ब्रिटिश सरकार ने उन पर मुकदमा चलाया, जिसे लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से जाना जाता है।
23 मार्च 1931 — बलिदान का दिन
अंततः 23 मार्च 1931 को शाम के समय, लाहौर जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दे दी गई। कहा जाता है कि फाँसी से पहले वे हँसते हुए और “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगाते हुए आगे बढ़े। उनकी उम्र उस समय मात्र 23-24 वर्ष के बीच थी। ब्रिटिश सरकार ने डर के कारण रात में ही उनके शवों का गुप्त रूप से अंतिम संस्कार कर दिया।
उनके विचार और आदर्श
भगत सिंह केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक विचारक भी थे। वे समाज में समानता, स्वतंत्रता और न्याय चाहते थे। उनका मानना था कि असली आज़ादी केवल अंग्रेजों से नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय से भी मिलनी चाहिए।
🇮🇳 शहीदी दिवस का महत्व
यह दिन हमें बलिदान और देशभक्ति की याद दिलाता है।युवाओं को प्रेरणा देता है कि वे देश के लिए कुछ करें। हमें अपने स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को याद रखने की सीख देता है
दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक भावना है
एक ऐसी भावना जो हमें अपने देश के प्रति समर्पण और कर्तव्य का एहसास कराती है। आइए, हम इस दिन इन अमर वीरों को नमन करें और उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लें।
🇮🇳 जय हिन्द — जय भाਰਤ

